रावण संहिता Ravana Samhita

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रावण संहिता (Ravan Samhita) एक प्राचीन ग्रंथ है जो ज्योतिष शास्त्र, तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद पर आधारित है। ऐसा माना जाता है कि इसे लंकेश्वर रावण ने स्वयं लिखा था, जो वेदों और शास्त्रों के महान ज्ञाता माने जाते हैं।
रावण संहिता में क्या-क्या शामिल है?
ज्योतिष शास्त्र – इसमें कुंडली, ग्रहों की चाल, भविष्यवाणी की विधियाँ और हस्तरेखा शास्त्र के बारे में बताया गया है।
तंत्र शास्त्र – इसमें तांत्रिक विधियों, मंत्रों, यंत्रों और तंत्र साधना की प्रक्रियाएं बताई गई हैं।
गुप्त विद्याएँ – जैसे मोहिनी विद्या, वशीकरण, मारण आदि पर भी इसमें चर्चा है।
आयुर्वेद – कई जगहों पर रोगों के इलाज के लिए आयुर्वेदिक उपाय और जड़ी-बूटियों का वर्णन मिलता है।
प्रेत विद्या और आत्मा से संबंधित ज्ञान – इसमें आत्मा, पुनर्जन्म और मृत्यु के बाद की स्थिति पर भी चर्चा है।
रावण संहिता का महत्व
यह ग्रंथ आज भी गुप्त और दुर्लभ माना जाता है।
कहा जाता है कि इसे पढ़ने और समझने के लिए विशेष योग्यता और गुरु की आवश्यकता होती है।
आमतौर पर यह पुस्तक सामान्य बाजारों में नहीं मिलती और इसके कुछ हिस्से ही प्रकाशित हुए हैं।
रावण संहिता: एक विस्तृत परिचय
परिचय: रावण संहिता एक अत्यंत प्राचीन और रहस्यमयी ग्रंथ है, जिसे लंका के सम्राट रावण द्वारा रचित माना जाता है। रावण केवल एक महान योद्धा और लंकेश्वर ही नहीं था, बल्कि वह वेदों, पुराणों, तंत्र और ज्योतिष शास्त्र का भी गहन ज्ञाता था। रावण संहिता उसी की विद्वत्ता का प्रमाण है। यह ग्रंथ मुख्यतः तंत्र, मंत्र, ज्योतिष, आयुर्वेद और आत्मज्ञान से संबंधित विषयों पर आधारित है।
इतिहास और उत्पत्ति: ऐसा माना जाता है कि रावण ने इस ग्रंथ की रचना भगवान शिव की कृपा से प्राप्त दिव्य ज्ञान के आधार पर की थी। रावण शिव का परम भक्त था और उसने कैलाश पर्वत पर घोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया था। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर रावण को दिव्य ज्ञान प्रदान किया, जिसे उसने संहिताबद्ध किया। इसी संकलन को “रावण संहिता” के नाम से जाना जाता है।
संरचना: रावण संहिता में कुल सात अध्याय होते हैं, जिन्हें सप्त कांड कहा जाता है:
प्रथम कांड – ज्योतिष शास्त्र इस भाग में कुंडली निर्माण, ग्रहों की चाल, नक्षत्रों का प्रभाव, दशा-अंतर्दशा, जन्मपत्रिका से भविष्यवाणी आदि विषयों पर चर्चा की गई है।
द्वितीय कांड – हस्तरेखा और लक्षण शास्त्र इसमें शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट, हथेली की रेखाएं, मुख के लक्षण आदि से व्यक्ति के स्वभाव, भविष्य और भाग्य की जानकारी दी जाती है।
तृतीय कांड – तंत्र शास्त्र तांत्रिक क्रियाएं, साधनाएं, मंत्र, यंत्र, कवच और हवन विधियों का वर्णन इसमें किया गया है। यह हिस्सा अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली माना जाता है।
चतुर्थ कांड – वशीकरण और मोहिनी विद्या इसमें प्रेम, आकर्षण, सम्मोहन और वशीकरण से संबंधित मंत्र-तंत्र दिए गए हैं। यह भाग आमतौर पर गुप्त रखा जाता है।
पंचम कांड – आत्मा, पुनर्जन्म और मृत्यु रहस्य इसमें आत्मा का स्वरूप, मृत्यु के पश्चात आत्मा की स्थिति, पुनर्जन्म का चक्र और पितृलोक की जानकारी दी गई है।
षष्ठ कांड – आयुर्वेद और रोग निवारण इसमें शरीर के रोगों के निदान और प्राकृतिक औषधियों से उपचार के उपाय बताए गए हैं। कई प्रकार की दुर्लभ वनस्पतियों का भी उल्लेख है।
सप्तम कांड – सिद्धियाँ और गुप्त विद्याएँ इस भाग में रावण द्वारा प्राप्त की गई सिद्धियों, योगिक क्रियाओं, गुप्त तांत्रिक विद्याओं और देवताओं को प्रसन्न करने की विधियों का वर्णन है।
मुख्य विशेषताएं:
गुप्त ज्ञान का भंडार: रावण संहिता में वर्णित अधिकांश ज्ञान अत्यंत गुप्त है, जिसे केवल योग्य और अनुभवी साधक ही समझ सकते हैं।
ज्योतिषीय सटीकता: इसमें ग्रहों और नक्षत्रों का इतना गहन विवरण है कि कई विद्वान इसे आधुनिक ज्योतिष से भी अधिक सटीक मानते हैं।
तंत्र और मंत्र शक्ति: इसमें शक्ति उपासना, काली, तारा, भैरव आदि देवताओं की साधनाएं और उनसे संबंधित तांत्रिक प्रयोग विस्तृत रूप में बताए गए हैं।
मृत्यु और आत्मा का रहस्य: आत्मा की अमरता और उसकी यात्रा का जो विवरण इसमें मिलता है, वह अत्यंत दुर्लभ और ज्ञानवर्धक है।
प्रसिद्धता और वर्तमान स्थिति: रावण संहिता का मूल ग्रंथ आज दुर्लभ माना जाता है। इसकी केवल कुछ प्रतिलिपियाँ ही विभिन्न साधुओं और गुरुओं के पास उपलब्ध हैं। कुछ प्रकाशकों द्वारा इसके अंशों को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया है, परंतु पूरा ग्रंथ आम जन के लिए उपलब्ध नहीं है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस ग्रंथ को पढ़ना और समझना हर किसी के बस की बात नहीं है, क्योंकि इसके लिए विशेष योग्यता और साधना की आवश्यकता होती है।
रावण का ज्ञान: रावण केवल युद्ध कला में पारंगत नहीं था, वह एक महान विद्वान, ब्राह्मण और शिव का अनन्य भक्त था। उसने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था और तंत्र, मंत्र, आयुर्वेद तथा खगोल विज्ञान में अद्वितीय ज्ञान प्राप्त किया था। उसकी यह विद्वत्ता रावण संहिता में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
निष्कर्ष: रावण संहिता एक ऐसा ग्रंथ है जो न केवल रावण की विद्वत्ता का प्रमाण है, बल्कि भारतीय तंत्र, ज्योतिष और अध्यात्म के क्षेत्र में अमूल्य धरोहर भी है। यद्यपि यह ग्रंथ आम लोगों से छिपा हुआ है, फिर भी इसके जो भी अंश उपलब्ध हैं, वे जीवन को नई दिशा देने में सक्षम हैं। यह ग्रंथ यह भी दर्शाता है कि रावण केवल एक खलनायक नहीं, अपितु ज्ञान और साधना का अद्वितीय प्रतीक भी था।
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